होम्योपैथी को समझें

बायोकेमिक टैबलेट (टिशू साल्ट) क्या हैं? होम्योपैथी से इनका संबंध

Read in English →

"बायोकेमिक" नाम से बिकने वाली छोटी सफ़ेद गोलियाँ — ये कहाँ से आईं, होम्योपैथी से इनका क्या संबंध है, कॉम्बिनेशन दवाएँ क्या हैं, और इस्तेमाल से पहले किन बातों का ध्यान रखें।

डॉ. मीनाक्षी श्रीवास द्वारा ·

भारत की लगभग हर होम्योपैथिक दुकान पर बायोकेमिक टैबलेट मिलती हैं — अक्सर नंबर वाली या किसी तकलीफ़ के नाम वाली "कॉम्बिनेशन" दवाओं के रूप में। मरीज़ अक्सर पूछते हैं कि ये क्या हैं, और क्या ये होम्योपैथिक दवा ही हैं। यह लेख इन सवालों का सीधा जवाब देता है।

बायोकेमिक पद्धति कहाँ से आई

बायोकेमिक पद्धति 1870 के दशक में जर्मन चिकित्सक डॉ. विल्हेम हाइनरिख शुसलर (Wilhelm Heinrich Schüssler) ने विकसित की थी, जो पहले होम्योपैथी की प्रैक्टिस करते थे। उनका मानना था कि कुछ गिने-चुने खनिज लवण — बारह "टिशू साल्ट" — शरीर की कोशिकाओं के लिए ज़रूरी हैं, और इन लवणों को छोटी, तैयार की गई खुराक में देकर बीमारी में मदद की जा सकती है।

होम्योपैथी से इनका संबंध

सिंगल साल्ट और "बायो-कॉम्बिनेशन"

टिशू साल्ट अकेले भी बिकते हैं और तय मिश्रण के रूप में भी, जिन्हें किसी तकलीफ़ के नाम से बेचा जाता है — जैसे "बायो-कॉम्बिनेशन नंबर…"। कॉम्बिनेशन दवाएँ सुविधाजनक लगती हैं, लेकिन ये व्यक्ति के अनुसार चुनी नहीं जातीं, और लेबल पर लिखा तकलीफ़ का नाम कोई निदान (डायग्नोसिस) नहीं है। इसी वजह से इस लेख में किसी खास साल्ट या नंबर की सिफ़ारिश नहीं की गई है।

किन बातों का ध्यान रखें

  • बिना कारण वज़न घटना, लगातार थकान, साँस फूलना, खून आना या तेज़ दर्द — इनमें डॉक्टर और जाँच ज़रूरी है, खुद से इलाज नहीं

असली दवा कैसे पहचानें

सही लेबल पर दवा का पूरा नाम, पोटेंसी, निर्माता, लाइसेंस नंबर, बैच नंबर और तारीख होती है। बिना लेबल की पुड़िया या ढीली गोलियाँ न लें। पढ़ें: असली दवा की पहचान और भंडारण · पोटेंसी क्या है।

डॉ. मीनाक्षी से परामर्श लें। उदयपुर क्लिनिक: सोमवार से शनिवार, सुबह 10 से दोपहर 1 बजे (अपॉइंटमेंट से) और शाम 6 से 9 बजे (बिना अपॉइंटमेंट)। वीडियो कॉल या WhatsApp पर ऑनलाइन परामर्श भी उपलब्ध है।

परामर्श बुक करें →  ·  रूट कॉज़ असेसमेंट शुरू करें →

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ये बारह खनिज 'टिशू साल्ट' की टैबलेट हैं, जो लैक्टोज़ के साथ कम पोटेंसी में तैयार की जाती हैं। यह पद्धति 1870 के दशक में डॉ. विल्हेम हाइनरिख शुसलर ने विकसित की थी।

ये होम्योपैथिक दवाओं जैसे तरीके से बनती हैं और उनके साथ बिकती हैं, लेकिन बायोकेमिक पद्धति का मूल सिद्धांत होम्योपैथी के 'समान से समान' के सिद्धांत से अलग है।

ये आमतौर पर कम खुराक वाली होती हैं, लेकिन व्यक्ति के अनुसार चुनी नहीं जातीं और खून की कमी या थायरॉइड जैसी समस्याओं की जाँच में देरी करा सकती हैं। डॉक्टर से पूछें और अपनी दवाओं की सूची में शामिल करें।

ये लैक्टोज़ से बनती हैं। लैक्टोज़ से परेशानी या डायबिटीज़ हो तो डॉक्टर को बताएँ।

यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, यह चिकित्सकीय सलाह, निदान या इलाज का विकल्प नहीं है। होम्योपैथिक उपचार हर व्यक्ति के लिए अलग होता है; असर हर व्यक्ति में अलग होता है और किसी विशेष परिणाम का वादा नहीं किया जाता। अपने डॉक्टर द्वारा दी गई दवाएँ जारी रखें।

यह भी पढ़ें: पोटेंसी क्या है · दवा खरीदना और रखना · दो दवाएँ साथ में · होम्योपैथी गाइड · हिंदी में सभी पेज

M
Dr. Meenakshi Shriwas
BHMS · MD (Homoeopathy) · PhD (Homoeopathy) · In practice since 2013
Associate Professor & PhD Guide — Rajasthan Vidyapeeth HMC&H